अभ्यास एवं वैराग्य साधना की लोकोपयोगिता

Author(s): नीरज कुमार

Abstract:

भारतीय दर्शन एवं योगशास्त्र में अभ्यास एवं वैराग्य को आत्मसाक्षात्कार की अनिवार्य दो धारणाएँ माना गया है। पतंजलि योगसूत्र में इन दोनों को चित्तवृत्ति निरोध की आधारशिला कहा गया है। यह शोध-पत्र अभ्यास एवं वैराग्य की परिभाषा, उनकी साधना पद्धति और विशेष रूप से समाज में उनके व्यावहारिक उपयोग पर प्रकाश डालता है। आधुनिक जीवन की आपाधापी में मनुष्य मानसिक असंतुलन, तनाव, और नैतिक पतन की ओर अग्रसर है। ऐसे में अभ्यास और वैराग्य की साधना उसे आन्तरिक स्थिरता, मानसिक शान्ति और सामाजिक उत्तरदायित्व की ओर ले जाती है। इस शोध में इन दोनों की संयुक्त क्रियात्मकता का विश्लेषण कर यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि अभ्यास एवं वैराग्य केवल आध्यात्मिक लक्ष्य की नहीं, अपितु सामाजिक, मानसिक एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान की कुन्जी हैं।

PDF URL: View Article in PDF