Author(s): अनीता रानी, डॉ. प्रवीण देशमुख
Abstract:
खगोलीय और भौगोलिक दृष्टि से ब्रज केवल यमुना के तटों और गोवर्धन की तलहटी तक सीमित भूभाग नहीं है, बल्कि यह सनातन रसभक्ति, वात्सल्य, और माधुर्य का वह चिद्-आकाश है जिसका केंद्र मथुरा वृन्दावन है । 'संस्कृति पथ के पथिक' के लेखक ने अपनी यात्रा वृत्तान्तात्मक स्मृतियों के माध्यम से यह प्रतिपादित किया है कि ब्रज की संस्कृति मूलतः 'आत्मदान, आत्म-तर्पण, समर्पण और परम स्नेह' की संस्कृति है। जहाँ अन्य संस्कृतियों में भौतिक उपलब्धियों को प्रधानता दी जाती है, वहीं ब्रज-मनस में 'लीला-पुरुष' श्रीकृष्ण और आत्मीय 'राधा-भाव' को जीवन का चरम लक्ष्य माना गया है । 'संस्कृति पथ के पथिक' संस्मरण के आलोक में ब्रज की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का अनुशीलन करना मुख्य उद्देश्य है। लेखक ने आधुनिकता और महानगरीय आपाधापी के युग में ब्रजभाषा की अंतर्निहित मधुरता, वहाँ के पारंपरिक त्यौहारों (यथा- लठामार होली), सात्त्विक खान-पान (कचौड़ी-पेड़ा) और यमुना-केन्द्रित लोक-जीवन के जिन अछूते प्रसंगों को उकेरा है । ब्रज केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, वरन् यह भक्ति, वात्सल्य, और माधुर्य रस का वह लोक-मनस है, जो यमुना की लहरों, गोवर्धन की तलहटी, और मथुरा-वृन्दावन की गलियों में स्पंदित होता है । लेखक ने संस्मरण की विधा के माध्यम से ब्रज के इस वैभव को आधुनिक विमर्श के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया है ।
PDF URL: View Article in PDF
